संजय कुमार सिंह की तीसरी पुस्तक, 'ईवीएम वाशिंग मशीन में घुली' देश की मौजूदा राजनीतिक स्थिति का सच बताती है। संजय का कहना है कि ईवीएम का विरोध भाजपा ने ही शुरू किया था और उसके तेज-तर्रार प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हन और उसके बाद सुब्रमण्यम स्वामी समेत कई और विशेषज्ञ ने इस पर किताबें भी लिखी हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि ईवीएम से चुनाव शुरू किए जाने के बाद कानून में संशोधन किए गए। यह सब 2014 में भाजपा को से पहले की बात है।

कई सवालों के घेरे में है ईवीएम सत्ता मिलने की साख

लेकिन सत्ता पाने के बाद भाजपा ने ईवीएम का विरोध छोड़ दिया। साथ ही ईवीएम का समर्थन करना शुरू कर दिया। 

चुनाव आयुक्त की नियुक्ति का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। पुस्तक में बताया गया है कि जीवीएल नरसिम्हन की किताब की भूमिका लाल कृष्ण आडवाणी ने लिखी थी और - ईवीएम को बदनामी से बचाने के लिए भाजपाई इको सिस्टम ने यह फैला रखा है कि जो हारता है वही ईवीएम की शिकायत करता है। दूसरी ओर, 2024 के लोकसभा चुनाव में सीटें कम होने पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मैंने पूछा ईवीएम जिन्दा है कि मर गया? कहकर ईवीएम की साख बचाने की कोशिश की थी। दूसरी ओर पुस्तक के लेखक का मानना है कि हरियाणा और महाराष्ट्र का मामला और खुला व स्पष्ट है। लेखक का तर्क रहा है कि कई बार ऐसा लगा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मामले में भी मनमानी की गई और किताब में ऐसे कई मामलों का जिक्र है, जिसमें उनके हिसाब से भाजपा और भाजपा की राजनीति पर सवाल उठाते हैं। पुस्तक को प्रवासी प्रेम पब्लिशिंग ने प्रकाशित किया है।

ईवीएम और राजनीति

नवोदय टाइम्स